Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
कुकर्मभ्यस्तु चेद्भीतिः सा समेह परत्र च ।
तस्मादेते समसुखे सर्वेषां मृतिजन्मनी ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
मर जानेवाले व्यक्ति को कुकर्मजनित नरकप्राप्ति की संभावना से भय कर्यो नहीं होगा 2 इस
आशंका को उठाकर कहते हैं /
कुकर्मों के कारण नरक आदि का जो भय है, वह तो यहाँ जीनेवाले को और परलोक में
मरनेवाले को समान ही है, नरक आदि दुःख और जीवन की ब्रह्मसुख सत्ता से अतिरिक्त भिन्न
सत्ता न होने के कारण दुःख की स्थिति भी सुखसत्ता से है, इसलिए उनमें विशेष (भेद) नहीं है ।
अतः सभी के मरण ओर जन्म समान सुखवाले हैं