Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

चिन्नभश्चिन्नभस्येव पयसीव पयोद्रवः । चित्त्वात्कचति यत्तेन तदेवेदं जगत्कृतम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तब उम्नीने यह जयत्‌ उत्पन्न किया हैं, यह श्रुतियों का कथन केसे युक्तिपूर्ण लो सकेगा, इस पर कहते हैं / जैसे जल में जलरूप द्रवत्व है, वैसे ही चिदाकाश में चिदाकाशरूप जगत्‌ है । चूँकि उस चिदात्मा के कारण यह अध्यस्त समस्त प्रपंच प्रकाशित होता है, इसीलिए जगत्‌ ब्रह्मरूप ही है ओर इसका निर्माण भी जगदाकार उस ब्रह्म ने ही किया है, यह श्रुतियों में प्रवाद है