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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

स्वप्ने तदेव जगदित्युदेति विमला यथा । काचकस्येव कचति तथेत्थं सादि सर्गखे ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रवाद को (अथ रथान्‌ रथयोगान्‌ इत्यादि शति में स्वप्नद्रष्टा में रथादि छृष्टिकठता के प्रवाद के सद्रथ ही समञ्ञना चाहिए, यह कहते हैं / जैसे स्वप्न मे विमल चेतन ही जगत्‌ के रूप मेँ उदित होता है अथवा जैसे काँचदोष से दूषित नेत्रवाले पुरुष के प्रति आकाश में केशोण्ड्रक आदि प्रतीत होते हैं, वैसे ही सृष्टिरूप से भावित चिदाकाश में इस तरह का विचित्र सादिरूप जगत्‌ प्रकाशित होता है