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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

चित्काचकस्य कचनं यथा स्वप्ने जगद्भवेत् । तथैव जाग्रदविधं तत्स्वमात्रमिदं स्थितम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में जगत्‌चितिरूप काँच का प्रकाश ही है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में भी विचित्र जगत्‌ भी चितिरूप कंच का प्रकाश “स्फुरण ही है, इसलिए यह जगत्‌ चिदाकाशमात्ररूप स्थित है