Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verses 38–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verses 38–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 38-41
संस्कृत श्लोक
चिरं यदनुसंधत्ते चेतः पश्यति तत्क्षणात् ।
चिरेण चाशापवनव्यक्तिवद्विततं यदा ॥ ३८ ॥
तदा वर्षशतेनात्र बोधबीजं वृतान्तरम् ।
आसीन्मे हृदयक्षेत्रे कालमेकं विकासतः ॥ ३९ ॥
संप्रबुद्धोऽभवन्मेऽथ जीवः संबुद्धवेदनः ।
शिशिरक्षीणगात्रस्य मधाविव रसस्तरोः ॥ ४० ॥
तच्छतं तत्र वर्षाणां निमेषमिव मे गतम् ।
बह्व्योऽपि कालगतयो भवन्त्येकधियो मनाक् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
छौ वर्गो के काद समाधि से व्युत्थान का कारण बतलाते हैं /
भद्र, दीर्घकाल तक मन जिसका स्मरण करता है, उसको वह तत्काल ही देखता है, इस
अकाट्य नियम के अनुसार सौ वर्ष के दीर्घकाल के बाद जब चित् आशा (दिशा) ओर पवन व्यक्ति
के सदृश विशाल हुआ, तब समाधि टूटने में कारण भूत कर्म हृदय में एक समय पैदा हो गया, उस
बीजरूप कर्म का भीतरी भाग ढका हुआ था । अनन्तर ज्ञातव्य वस्तु जानकर मेरा जीव समाधि से
ऐसे प्रबुद्ध हो गया, जैसे शिशिर में क्षीण शरीर हुए वृक्ष का रस चैत्र मास में (वसन्त में) प्रबुद्ध हो
जाता है । वहाँ पर वे मेरे सौ वर्ष एक निमेषमात्र के सदृश व्यतीत हो गये, क्योकि एकाग्रचितवाले
पुरुष के लिए बहुत काल की गतियाँ भी अत्यन्त स्वल्प हो जाती हैं