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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

विकासमागतो बाह्यं गतो बुद्धीन्द्रियक्रमः । वासन्तः पुष्परूपेण मदस्येव रसो मम ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके बाद क्या हुआ, उतने बतलाते हैं । जैसे वृक्षों के मद का यानी पल्लव आदि की पुष्टि के हेतुभूत हर्ष का कारणभूत भीतरी वसन्तकाल का रस पुष्परूप से बाहर आता है, वैसे ही धीरे धीरे विकास प्राप्तकर बुद्धि-इन्द्रियों की परम्परा बाहर की ओर प्रवृत्त हो गई