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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । त्वामप्युदितनिर्वाणमहंकारपिशाचकः । बाधते किमिति ब्रूहि मुने संदेहशान्तये ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

भां... अहमिति ग्रस्तः पिशाचः“ इस कथन तथा श्रोन्नामसन्नमन वायुरिवोग्रवृक्षम्‌” इस हृष्टान्तोक्ति से महाराज वस्तिष्ठ को भी अहकाररुपी पिशाच द्वारा बाधा पहुँचायी गई; ऐसा हो जाने से ज्ञानफल की अनित्यता की संभावना करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, निर्वाण प्राप्त किये हुए आपको भी क्या अहंकाररूपी पिशाच बाधा पहुँचाता है ? मेरे सन्देह की निवृत्ति के लिए यह मुझसे कहिये

सर्ग सन्दर्भ

छप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग ज्ञानी और अज्ञानी के अहंकार के विशेष ज्ञान के लिए ज्ञान से बाधित हुए दृश्यप्रपंच की चिन्मात्रता का समर्थन।