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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अहंभावं विना देहस्थितिस्तज्ज्ञाज्ञयोरिह । आधेयस्य निराधारा न संस्थेहोपपद्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र प्रारब्धशेष का भोय ही प्रयोजन होने से जले हुए करत्र- जैसे देहधारण के निरित्त केवल अहंकारआभास की प्रतीति होने से अज्ञानियो की तरह ज्ञानियों को संसारवन्धन की प्राप्ति नहीं होती, यह दिखलाने के लिए महाराज वस्तिष्ठजी अज्ञानी के अहंकार की अपेक्षा तत््वज्ञानी के अहंकार में निर्दोषता बतलाते हुए उत्तर देते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इस संसार मे अहंभाव के बिना तत्त्वज्ञानी और अज्ञानी दोनों की देह-स्थिति नहीं हो सकती, क्योंकि हे श्रीरामचन्द्रजी, आधेय पदार्थ की निराधार स्थिति कभी नहीं उत्पन्न हो सकती