Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसर्गोऽत्र दृष्टान्तः प्रत्यहं योऽनुभूयते ।
स्वयं संवेदने स्वप्ने स्फुरत्यद्रिपुराकृतिः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अविकृत ब्रह्म ही विकृत जगद्रूप से जो स्फुरित होता है उसमें स्वप्न का स्वात्मा ही दृष्टान्त
है, यह कहते हैं /
प्रतिदिन जो अनुभूत होता है वह स्वप्न-सर्ग ही इस विषय में दृष्टान्त है, क्योकि स्वप्न के
विषयों में स्वयं आत्मा ही पर्वत, नगर आदि की आकृतियों में स्फुरित होता है