Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
नेह सर्गोऽस्ति नैवायं पृथ्व्यादिगणगोलकः ।
सर्व शान्तमनालम्बं ब्रह्मैव ब्रह्मणि स्थितम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, परब्रह्म
परमात्मा में यह सृष्टि नहीं है ओर न ये पृथिवी आदि लोक ही हैं । सब शान्त, अवलम्बनशून्य
एकमात्र ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है