Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
सर्वशक्त्यात्म तद्ब्रह्म यथा कचति यादृशम् ।
रूपमत्यजदेवाच्छं तथा भवति तादृशम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वशक्तिसम्पन्न वह ब्रह्म जैसे जिस तरह का स्फुरित
होता है, वह अपने तुच्छरूप का परित्याग न करते हुए वैसे उस तरह का हो जाता है