Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नपुरं जन्तोश्चिन्मात्रप्रविजृम्भितम् ।
तथैव सर्गः सर्गादौ शुद्धचिन्मात्रजृम्भितम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
स्वप्न का नगर प्राणी के लिए चिन्मात्र का विलास ही है । वैसे ही सृष्टि के प्रारम्भ में यह सृष्टि भी
शुद्ध चिन्मात्र का विलास ही हैं