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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

स्वच्छे चित्परमाकाशे चिदाकाशो य आस्थितः । स्वभाव एव सर्गोऽसाविति तेनैव भावितः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वच्छ चिद्रूप परमाकाश में जो चिदाकाश स्थित है उसी ने अपने स्वभाव की सृष्टिरूप में भावना की है वही यह सृष्टि है अर्थात्‌ चिद्रूप जो ब्रह्म है उसका स्वभाव ही यह सृष्टि है