Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
आकाशकोशविशदाकृतिरेव तिष्ठ निर्देशवच्चिरमपह्नुतसर्वभावः ।
अद्यादितश्च किल चिन्मयमेव सर्वे नो दृश्यमस्ति शिवमेवमशेषमित्थम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, चिरकाल के लिए सम्पूर्ण भावों का अपहव करके अवकाशरहित
पत्थर के सदृश बनकर आकाशकोश की तरह निर्मल-आकार से ही आप अपने स्वरूप में
स्थित रहिये, क्योकि इस तरह निश्चित है कि इस सृष्टिकाल में तथा इस सृष्टि के पूर्वकाल
में सब कुछ चिन्मय शिव ही स्थित है । इस प्रकार से जो दृश्यप्रपंच दिखाई दे रहा है वह
सब कुछ नहीं है