Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
नाहमस्मि न चान्योऽस्ति सर्वं नास्तीति निश्चये ।
प्रकृतव्यवहारस्त्वं शिलामौनमयो भव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
आप भरी मेरे समान ही भीतर से सबका बाध करके अद्वितीय बन जाइये, यह कहते हैं /
वास्तव में तो न मैं हूँ, न कोई अन्य है और न यह सब दृश्य प्रपंच ही है, ऐसा निश्चय
करके हे श्रीरामचन्द्रजी, आप भी प्रकृत व्यवहार का सम्पादन करते हुए पत्थर के समान मौनमय
हो जाइये