Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यथा मम तथान्येषामपि बोधवतामिह ।
अग्नित्वमिव चित्राग्नेर्नास्त्ययं बोधविभ्रमः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अहंभावादि
बोधविभ्रम जिस तरह मेरी दृष्टि में नहीं है, वैसे ही तत्त्वज्ञानी ओर महानुभावों की दृष्टि में यहाँ नहीं
है, जैसे कि चित्रगत अग्नि में दाहक्रिया किसी भी विद्वान् पुरुष की दृष्टि में नहीं है