Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अहंभावस्य नैवाहं नाहंभावो ममेति च ।
तेन विद्धि चिदाकाशमेवेदमिति निर्घनम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र सम्बन्धत्यागर से भी यह अहम्भाव पीड़ा नहीं पहुँचाता, फिर ज्ञान से बाधित हो जाने
पर तो पूछना ही क्या, इस आशय से कहते हैं /
न तो कोई मैं अहंकार का हूँ और न यह अहंकार ही मेरा कुछ लगता है । यों जानकर हे
श्रीरामचन्द्रजी, इस सम्पूर्ण संसार को आप निर्घन चिदाकाश ही जानिये