Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आदावेव हि नोत्पन्नमद्यापि न च विद्यते ।
दृश्यं यच्चावभातीदं तद्ब्रह्म ब्रह्मणि स्थितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यों जब ब्रह्मगात्रता ही है, तब दृश्य की अनुत्पत्ति ही फलित हुई. यह कहते हैं /
श्रीरामभद्र, परमार्थदृष्टि से दृश्य पहले ही उत्पन्न नहीं हुआ है ओर आज भी नहीं है, परन्तु
जो इसका अवभास होता है, वह ब्रह्म में स्थित ब्रह्म ही हे