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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतत्ते वर्णितं राम मुख्यमेव मयाखिलम् । योऽयमालक्ष्यते सर्गः स ख एव खमास्थितम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक हैं, आपने जिर पक्ष का शंका में उल्लेख किया है, ठीक यही पक्ष युख्यरूप से मुझे भी अभिप्रेत है, परन्तु विशुद्ध चिदाकाश का सहसरा परिचय हो नहीं सकता, इसलिए परिचयोपायरुप से प्रत्येक शरावादि-उयहित चेतन में भी समस्त जगत्‌ का अध्यास (आरोप) है, यह मैने बतलाया है, इस आशय से उत्तर देते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तत्‌-तत्‌ पदार्थों से उपहित प्रत्येक चेतन में समस्त जगत्‌ का आरोप है, यों कहते हुए मैंने आपसे वस्तुतः मुख्य चेतन में समस्त जगत्‌ का आरोप है, इसी का वर्णन किया है, इसलिए जो यह सृष्टि दिखाई पड़ती है, वह चिदाकाश में चिदाकाशात्मक ही स्थित है