Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कुड्यादौ सन्ति सगौंघा इति चेत्कथ्यते मुने ।
तत्खे विभान्ति सर्गौघा इति किं न प्रदृश्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, दीवार, पाषाण आदि के उदर चेतन में अनेक सर्गो का
आरोप है, यही अभिप्राय यदि पाषाणाख्यायिका से बतलाया जाता है, तो मैं कहता हूँ कि
इसकी अपेक्षा यही अभिप्राय क्यों नहीं बतलाया जाता कि शुद्ध चिदाकाश में हजारों सृष्टियों
का आरोप है । तात्पर्य यह है कि दीवार आदि भाव ओर शून्यात्मक आकाशादि अभाव पदार्थों
से युक्त चेतन में सभी सर्गाँ का आरोप असंकीर्णरूप से हो सकता है, यह यदि आपकी
आख्यायिका का अभीष्ट अर्थ है, तब शुद्ध चिदाकाश में सब जगत् का अध्यास है, यही पक्ष
क्यों मान न लिया जाय, जिससे कि अध्यस्त जगत् का बाध हो जाने पर शुद्ध ही बच जाता
है, यह दूसरी बात भी अनुकूल हो, इस प्रकार की श्रीरामभद्र की आशंका है