Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
शान्तमेकमनाद्यन्तमिदमच्छमनामयम् ।
व्यवहारवतोऽप्यङ्ग ज्ञस्य मौनं शिलाघनम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव तत्त्ववेत्ताओं के लिए व्यवह्मरकाल में भी वह कैसा ही रहा हे यह कहते हैं ।
हे प्रिय श्रीरामजी, व्यवहार कर रहे ज्ञानी के लिए भी यह सब कुछ शान्त, एक, आदि-
अन्तरहित, स्वच्छ, निर्विकार, शिला के सदुश अतिघन, मौन ब्रह्मरूप ही रहता है, तनिक भी
उससे पृथक् या भिन्न नहीं रहता