Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
निर्वाणमेवमखिलं नभ एव दृश्यं त्वं चाहमद्रिनिचयाश्च सुरासुराश्च ।
तादृग्जगत्समवलोकय यादृगङ्ग स्वप्नेऽथ जन्तुमनसि व्यवहारजालम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्णित पाषाणाख्यायिका का जो तात्पर्य है, उसका उपसंहार करते हैं /
हे श्रीरामजी, यह समस्त दृश्य निर्वाणरूप एवं चिदाकाशरूप ही है । आप, हम, पर्वत, सुर,
असुर आदि भी तद्रूप ही हैं । भद्र, जगत् भी आप वैसा ही आत्मरूप समझिए, जैसा जागने के बाद
जन्तु के मन में स्वप्न में देखा गया व्यवहार, स्मृति में आने पर भी, आत्मरूप है