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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अनन्तरं नभःकोशकुंटीकोटरतो मुने । तव ध्यानात्प्रबुद्धस्य वृत्तं वर्षशतेन किम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह पिछले दो सर्गो से प्रासंगिक प्रश्नविषय का निरूपण हो जाने पर अब श्रीरामजी आख्यायिका का अवशिष्ट भाग छुनने के लिए पूछते हैं / श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, उस आकाशकोश की कुटिया से सौ वर्ष के बाद आपका ध्यान टूट जाने के अनन्तर कौन-सी जानने लायक बात हुई, यह मुझसे कहिए

सर्ग सन्दर्भ

अद्वावनवँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग उक्त एकान्तशून्य प्रदेश मेँ समाधि टूट जाने पर वसिष्ठजी को सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण और ध्वनिश्रवण के कारण के अन्वेषण के लिए ध्यान करने पर अनन्त कोटि जगत्‌ का ज्ञान होना- वर्णन।