Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
क्रमात्तदपि संत्यज्य बुद्धितत्त्वपदं गतः ।
संपन्नोऽहं चिदाकाशे जगज्जालैकदर्पणः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद
उनका भी क्रमशः परित्यागकर बुद्धितत्त्व के स्थान में पहुँच गया, फिर उसका भी त्यागकर
चिदाकाशरूप वास्तविक स्वरूप में पहुँच गया और वहाँ पहुँचकर अपनी आत्मा में अध्यस्त
समस्त जगत् के प्रतिबिम्बों का एक दर्पणरूप बन गया