Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ततस्तेन स्वभावेन भूतव्योमैकतामहम् ।
संप्रयातोऽम्बुनैवाम्बु सौरभं सौरभेण वा ओ ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र इसके बाद उसी चित्स्वभाव
से मैं भूताकाश के साथ एकरूप ऐसे बन गया, जैसे सामान्य जल के साथ समुद्रादिजल या
सामान्य सौरभ के साथ कमलादि सौरभ एकरूप बन जाता है