Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
स्वप्नरूपाणि सुप्तानां तुल्यकालं नृणामिव ।
महारम्भानुमृष्टानि शून्यानि च परस्परम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें दृष्टान्त देते हैं /
एक समय सोये हुए पुरुषों के लिए वे सृष्टियाँ स्वप्नरूप थी, एक दृष्टि से बड़े-बड़े समारोहों
से पूर्ण थी, तो दूसरे की दृष्टि से उत्तरोत्तर विमर्दित थी अतएव परस्पर शून्य अशून्यरूप थी