Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अन्तरन्तस्तदन्तश्च स्वकोशेऽप्यणुकं प्रति ।
जातानि जायमानानि कदलीदलपीठवत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
किन्हीं में केवल देवताओं
की ही सृष्टि थी, किन्हीं में अधिक केवल मनुष्य ही थे, किन्हीं में अधिकता दैत्यों के समूहों की थी
और कुछ तो कीटों से ही नीरन्ध्र थीं ॥३ २॥ कहीं पर कदलीस्तम्भ के दल के सदृश प्रत्येक परमाणु
के भीतर, उसके भीतर के भी भीतर कल्पित अपने कोश में अनेक जगत् उत्पन हो रहे थे और कुछ
उत्पन्न भी हो चुके थे