Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
परस्परमदृष्टानि नानुभूतानि वै मिथः ।
सैनिकस्वप्नजालानि जातानीव महान्त्यपि ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
सैनिकों के स्वप्नों के सदृश उत्पन्न हुए बड़े भी कुछ सर्ग एक दूसरे
से छिपे थे और किन्हीं का परस्पर अनुभव भी नहीं हो रहा था