Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
विविधान्यप्यनन्तानि स्वच्छाकाशात्मकान्यलम् ।
अन्योन्यमन्यवृत्तीनि न मिथोऽन्यस्थितीनि च ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ तो भिन्न-भिन्न तरह
की सृष्टियाँ थी, कुछ असीम थीं, कुछ स्वच्छ आकाश के सदृश निर्मल थीं, किन्हीं मे भिन्न-भिन्न
क्रिया-कर्म थे और कुछ विषम स्थितिवाली थीं