Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
महाकर्तृण्यकर्तॄणि न कृतान्येव खानि वा ।
स्वयं संपन्नरूपाणि चिद्व्योन्येव कृतानि वा ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टि को बतलानेवाली श्रुति की दृष्टि से तो उन सबका
कर्ता ब्रह्मा ही है और “अपूर्वमनपरम् इत्यादि श्रुतियों की दृष्टि से उनका कर्ता ब्रह्मा नहीं भी है
वास्तव में तो वे किसी से निर्मित हैं ही नहीं, किन्तु आकाशरूप (शून्यरूप) ही हैं । यद्यपि वस्तु
स्थिति ऐसी है, तो भी महाचितिरूप आकाश में स्वयं ही अपने रूप को धारण कर वे स्थित हैं,
परन्तु किसी के द्वारा सम्पादित भी प्रतीत होते हैँ