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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

परमार्थमयान्येव तदन्यद्वोदितान्यपि । अलब्धान्येव लब्धानि सदाऽसन्त्येव सन्ति च ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तुतः ये जगत्‌ परमार्थ चिद्रूप ही हैं, फिर भी अन्य से उत्पन्न मालूम पडते हैं, वस्तुतः अप्राप्त ही हैं, फिर भी प्राप्त-से प्रतीत होते हैं, सदा असद्रूप ही हैं, फिर भी सद्रूप से भासते हैं