Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
विद्याधर उवाच ।
यदुदारमनायासं क्षयातिशयवर्जितम् ।
पदं पावनमाद्यन्तरहितं तद्वदाशु मे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अतः वार साधनों से सम्पन्न मुझ ब्ह्यजिज्ञायु को हे व्रह्मन्. आप ब्ह्मोपदेश दीजिये, यह
कहते हैं /
विद्याधर ने कहा : हे भगवन्, आप मुझे उस परमपावन पद का शीघ्र उपदेश दीजिये । जो
पूर्णरूप से कृपणता का निवर्तक, दुःखरहित तथा निरतिशयानन्दरूप होने से अति उदार है,
आयासहीन तथा क्षय एवं अतिशय से शून्य है, आदि और अन्त से रहित है
सर्ग सन्दर्भ
पाँचवाँ सर्ग समाप्त छठा सर्ग चिरकाल तक दिव्य भोग को भोगे हुए विद्याधर के द्वारा परीक्षित विषयों में उन्मुख इन्द्रियों की नीति का वर्णन ।