Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
पर्याकुलानि मलिनानि विपत्प्रदानि दुःखोर्मिमन्ति गुणकाननपावकत्वात् ।
हार्दान्धकारगहनानि तमोमयानि जित्वेन्द्रियाणि सुखमेति च किं ममार्थैः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने ये इन्द्र्यो हृदय में रूढ हैं, तमोमय हैं,
अन्धकार से भरे सघन जंगल के तुल्य हैं, काम आदि वानरो से व्याप्त हैं एवं प्राण,मन, देह और
हृदयस्थ भूख आदि दुःखरूपी छः तरंगों से युक्त हैं । तरगों से युक्त होती हुई भी दैवात् कहीं
अंकुरित हुए शम-दमादि गुणरूपी जंगल की दाहक होने से ये विपत्ति देनेवाली तथा मलिन हें ।
अतः इस तरह की इन्द्रियों को एवं उनके आश्रय मन को जीतकर प्राणी सुखी हो सकता है,
सांसारिक इन भोगों से कदापि सुखी नहीं हो सकता । अतः मुझे विद्याधरो के भोगरूपी इन पदार्थो
से कोई मतलब अब नहीं हँ । हे भगवन्, यही कारण है कि विरक्त जिज्ञासु होकर मैं आपकी शरण
में आया हूँ