Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 5, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
विद्याधर उवाच ।
मृदूनि परितापीनि दृषद्दृढबलानि च ।
छेदे भेदे च दक्षाणि स्वशस्त्राणीन्द्रियाणि च ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पत्थर से भी अधिक दृढ़ और बलवान्, छेदन और भेदन में दक्ष अपने शरीर के अन्दर प्रविष्ट हुए
बाण आदि शस्त्र ओर इन्द्र्यो तुल्य हैं