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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verses 10–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verses 10–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 10-13

संस्कृत श्लोक

दृष्टाश्चैत्ररथोद्यानभुवः कुसुमकोमलाः । कल्पवृक्षलतादत्तसमस्तविभवश्रियः ॥ १० ॥ विहृतं मेरुकुञ्जेषु विद्याधरपुरेषु च । विमानवरमालासु वातस्कन्धस्थलीषु च ॥ ११ ॥ विश्रान्तं सुरसेनासु कान्ताभुजलतासु च । हारिहारविलासासु लोकपालपुरीषु च ॥ १२ ॥ न किंचिदुचितं साधु सर्वमाधिविषोष्मणा । दग्धं भस्मायते तात विज्ञातमधुना मया ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्क्तभोगरी होने के कारण सवत्र नीरसता दिखलाते है / जहाँ कल्पवृक्ष -वल्ली द्वारा अनेक तरह की विभव-सम्पत्तियो प्रदान की जाती है, वैसी कुसुम के सदृश अत्यन्त कोमल चैत्ररथ की उद्यानभूमिर्यो भी मैंने देख ली, यानी वहाँ के समस्त भोगों का उपभोग कर लिया । हे भगवन्‌, मेरु के कुंजों तथा विद्याधरो के नगरों मे मेने खूब विहार कर लिया । इतना ही नहीं, मैंने सर्वोत्तम अनेक जाति के विमानों एवं वायु के स्कन्धो की भूमियों मे यानी शीतल- मन्द सुगन्ध हवा मेँ भी इच्छानुसार विहार कर लिया । हे भगवन्‌, देवताओं की सेनाओं में, सुन्दर स्त्रियों की भुजलताओं में तथा हारादि से विभूषित कमनीय नायिकाओं के मनोहर विहारचमत्कारों से युक्त लोकपालों की नगरियों में चिरकालतक विश्राम भी मैंने खूब किया । हे तात, मैंने अब यह भलीभाँति जान लिया कि इनमें कोई भी पदार्थ सुखदायक नहीं है। मानसिक दुःखरूपी विष की उष्णता से सबके सब दग्ध होकर भस्म हुए-जैसे मुझे प्रतीत हो रहे है