Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
रूपालोकनलोलेन वनिताननगृध्नुना ।
सावभासेन दोषाय दुःखं नीतोस्मि चक्षुषा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
किस तरह के विवेकज्ञान से किस-किसका कैसे-कैसे परिज्नान किया, इसको पहले चश्च
आदि उदरियो में दिखलाते हैं
रूप देखने में अति चपल, स्त्रियों के मुख देखने की स्पृहा रखनेवाले तथा बाह्य और
आभ्यन्तर प्रकाशयुक्त नेत्र ने अपने विषयों के सम्बन्ध द्वारा मन को दूषित करने के लिए मुझे
भारी दुःख में ढकेल दिया है