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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

प्राप्तेन येन नो भूयः प्राप्तव्यमवशिष्यते । तत्प्राप्तौ यत्नमातिष्ठेत्कष्टयापि हि चेष्टया ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में मनुष्य को क्या करना चाहिये, यह कहते &ै/ जिसके प्राप्त हो जाने से फिर कोई दूसरा प्राप्त करने योग्य पदार्थ अवशिष्ट नहीं रह जाता, हे मुने, सो कष्टपूर्ण चेष्टा से भी उसकी प्राप्ति में मनुष्य को सदा प्रयत्नशील बनना चाहिये