Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
दृश्यदृष्टिरियं भ्रान्तिराकाशतरुमञ्जरी ।
चिद्व्योमाङ्ग कमेवेति तत्राहमनुभूतवान् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यों विचार करने पर अपने को जो अनुभव हुआ, उत महाराज वस्तिष्ठजी बतलाते है /
हे प्रिय श्रीरामजी, यह जो दृश्यों का ज्ञान होता है, वह भ्रम है, यह आकाशवृक्ष की मंजरी ही
है यानी असत् है, इसलिए जगत् में परिशिष्ट जो चिदाकाश है, वही सुख यानी निरतिशयानन्दरूप
है ह इसका मेने अनुभव किया