Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अनन्यमात्मनो ब्रह्म सर्वं भामात्ररूपकम् ।
प्रकाशनमिवालोकः करोति न करोति च ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र प्रकाशरूप ब्रह्म अपने अनन्य (अभिन्न) सब कुछ उस तरह करता है ओर नहीं
भी करता, जिस तरह आलोक प्रकाश करता है ओर नहीं भी करता । आलोक अपने से अतिरिक्त
प्रकाश न होने के कारण प्रकाश को नहीं करता, यह कहना वास्तव में ठीक ही हे