Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
प्रजास्तमसि पश्यन्ति पश्यन्त्येव न तेजसि ।
उलूकस्य समाचारास्तस्यैव सदृशस्वराः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर अन्धकार में प्रजाएँ देखती हैं और
कहीं प्रकाश में भी नहीं देखती । ठीक उल्लूओं के जैसा उनका व्यवहार है और उन्हीं के जैसा वे
शब्द भी करती हैं