Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अनन्तापारपर्यन्त शून्यमेव बहु क्वचित् ।
यत्नतः संविदाप्नोति तस्यान्ते न जगत्पुनः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर सृष्टि भेद की वासना ही नहीं रहती, इसलिए अव्याक्रत आकाशमात्ररूपता से ही वहाँ
भावना होती है, यह कहते हैं ।
कहीं पर तो अधिकतर चारों ओर अनन्त अपारशून्य ही शून्य है । कहीं पर प्राणी यत्न से
आत्मचिति प्राप्त करता है, तो शून्य के तिरस्कार से फिर जगत् देखता है