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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

वाक्यसंविद्विहीनत्वान्मूकान्यन्यानि कानिचित् । स्पर्शसंविद्विहीनत्वादश्माङ्गानीव कानिचित् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ दुसरे वाक्यार्थबोध न होने के कारण मूक हैं, स्पर्शज्ञानशून्य होने के कारण पत्थर के अंगों के सदृश त्वगिन्द्रिय रहित हैं