Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रमयान्येव दृष्टान्यपि च कानिचित् ।
व्यवहारीण्यप्यग्राह्याण्येव नित्यं पिशाचवत् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ तो मनोराज्य के सदृश
विचित्र ही देखे गये, कुछ तो व्यवहार करनेवाले हैं, परन्तु पिशाचों के सदृश उद्भूत गुणों से उनका
ग्रहण होता है