Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
कानिचिद्वातपूर्णानि सर्वाकाराणि कानिचित् ।
जगन्ति व्योमरूपाणि वत तत्र कचन्ति खे ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ जगत् वायुओं से परिपूर्ण
हैं, यानी समस्त कार्यों में समर्थ समस्त वस्तुओं से परिपूर्ण हैं आश्चर्य है कि कुछ तो आकाशरूप
ही हैं, फिर भी चिद्रूप आकाश में वे स्फुरित होते हैं