Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
जलैकपरिपूर्णेषु तिष्ठन्त्युर्वीवनाद्रिषु ।
भ्रमन्त्यन्येषु भूतानि नित्यमेवोग्रमीनवत् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ दूसरे केवल जल से ही परिपूर्ण पृथ्वी, वन, पर्वत आदि हैं, उनमें भी प्राणी, मगर के
सदृश, निरन्तर ही घूमा करते हैं