Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verses 61–62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verses 61–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
अन्येष्वग्न्येकपूर्णेषु जलादिरहितान्यपि ।
भूतान्यग्निमयान्येव स्फुरन्त्यलमलातवत् ॥ ६१ ॥
अन्येष्वनिलपूर्णेषु भूतान्यस्तेतराण्यपि ।
वातमात्रमयाङ्गानि स्फुरन्त्यर्जुनवातवत् ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
दुसरे जो जगत् केवल अग्नि से ही पूर्ण है, उनमें जल
आदिसे रहित भी प्राणी, अलातचक्र के सदुश यानी भ्रमण कर रहे उल्मुक की नाई, केवल अग्निरूप
होकर ही खूब चलते फिरते हैं