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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

पातालपातिषु तथाम्बरमुत्पतत्सु तिष्ठत्सु विभ्रमपदेष्वथ दिङ्मुखेषु । नानाजगत्सु किमिवास्ति मया न दृष्टं यन्नाम चिज्जलधिचञ्चलबुद्बुदेषु ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

उम्र चिदाकाश में नीचे, ऊपर एवं चारों ओर कल्पित दिशाओं में उड़ रहे वित्र-विचित्र सब जग्रत्‌ और उनमें रहनेवाली अनेक तरह की वस्तु मैने देखी; यों उपसंह्ार करते हैं। हे श्रीरामभद्र, कोई पाताल में गिर रही हैं, कोई आकाश में उड़ रही हैं, और कोई दिशाओं के मुख में स्थित हैं -इस तरह की केवल विभ्रम के कारण ज्ञात होने वाली अनेक तरह की सृष्टियों में, जो कि चितिरूप समूद्र के बुद्बुदों के ही स्वरूप में हैं, मैंने जो न देखी हो, वह वस्तु ही कौन-सी है, अर्थात्‌ कोई नहीं । सभी तरह की असम्भव वस्तुएँ मैंने उनमें देखी, यह भाव है