Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
TODO
हिन्दी अर्थ
यह जो परमार्थ
ज्ञानरूप आत्मा है, वह काटने के अयोग्य है । वह परमार्थ चिति (ब्रह्म) अज्ञानियों को दिखाई नहीं
पड़ती, उसका जो कल्पित हृदय है, वह जगत् ही है । जैसे उस परमार्थ चेतन की उत्पत्ति ओर
विनाश नही होता , वैसे ही उसके हृदयभूत जगत् एवं जगत् के हेतु अज्ञान के अनुभव की भी
उत्पत्ति या विनाश नहीं होता । केवल स्मरण और विस्मरण स्वभावरूप से अनुभव और अनुभव वह
कल्पना करती है