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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

यथैव स्वप्नसंकाशो व्यवहारः खमेव सः । तथैव त्वमिमं विद्धि मामात्मानं जगच्च खम् ॥ ३७ ॥ यथा स्वप्नजगद्रूपं खमेवैवमिदं जगत् । जाग्रदादौ स हि स्वप्नः सर्गादौ जगदुद्भवः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके साथ उस समय का मेरा व्यवहार भी वैसा ही था, यह कहते है / हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप्नसदृश वह व्यवहार आकाशरूप ही था, वैसे ही यह आत्मा, में तथा जगत्‌ भी चिदाकाशरूप ही है यह आप जान लीजिये