Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
निरुपादानसंभारमभित्तावेव चिन्नभः ।
पश्यत्यकृतमेवेमं जगत्स्वप्नं कृतं यथा ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उपादान
आदि सामग्री के बिना अभित्ति में ही चिदाकाश इस जगद्रूप स्वप्न को बिना निर्मित हुए ही निर्मित-
सा देखता है